bengal election
राष्ट्रीय

चार चैनलों के ओपिनियन पोल मन मुताबिक नहीं फिर भी पश्चिम बंगाल में बीजेपी का हौसला है बुलंद

khaskhabar/ओपिनियन पोल (Opinion Poll) का नतीजा तो सामने आ गया. अगर अंतिम परिणाम इसी के अनुसार हुआ तो पश्चिम बंगाल (West Bengal) में लगातार तीसरी बार तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सरकार बनेगी और ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) एक बार फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते दिखेंगी. लेकिन अगर ओपिनियन पोल ही जनता के मूड का सही पैमाना होता तो किसी भी चुनाव से जुड़ा रोमांच, रोमांच नहीं रहता. पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने वाली है, पर सबकी नज़र पश्चिम बंगाल के चुनाव पर अपेक्षाकृत ज्यादा है.

khaskhabar/ओपिनियन पोल (Opinion Poll) का नतीजा तो सामने आ गया. अगर अंतिम परिणाम इसी के अनुसार हुआ तो पश्चिम बंगाल (West Bengal) में लगातार तीसरी बार तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सरकार बनेगी और ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) एक बार फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते दिखेंगी. लेकिन
POSTED BY KHASKHABAR

स्वतंत्र भारत में पहली बार भारतीय संविधान के तहत चुनाव

कारण साफ़ है, इतिहास गवाह है कि पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल की आसानी से हार नहीं होती. पिछले 71 वर्षों में, जबकि स्वतंत्र भारत में पहली बार भारतीय संविधान के तहत चुनाव हुआ था, अब तक सिर्फ चार दलों की ही सरकार बंगाल में बनी है. या यूं कहें कि सिर्फ दो दलों की ही सरकार बनी है तो गलत नहीं होगा, क्योकि इनमे से बंगला कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस पार्टी से ही निकल कर अलग पार्टी बनी थी.

ममता बनर्जी फ़िलहाल पिछले 10 वर्षों से मुख्यमंत्री

बंगला कांग्रेस के नेता अजय मुख़र्जी ने भले ने ही तीन बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, पर उनका कुल कार्यकाल दो साल का ही रहा. सीपीम के नेतृत्व वाली वाममोर्चा की सरकार 34 साल तक चली और उसके बाद कांग्रेस पार्टी से अलग हो कर ममता बनर्जी फ़िलहाल पिछले 10 वर्षों से मुख्यमंत्री हैं. निर्दलीय प्रफुल्ल चंद्र घोष भी मुख्यमंत्री रहे थे, पर मात्र तीन महीनों के लिए. बाकी के समय या तो कांग्रेस पार्टी सत्ता में रही या फिर राष्ट्रपति शासन ही रहा. इसका मतलब कतई यह नहीं है कि पश्चिम बंगाल की जनता बदलाव नहीं चाहती.

नक्सलवाद की शुरुआत भी पश्चिम बंगाल से ही हुई

सीधे शब्दों में अगर कहें तो पश्चिम बंगाल के मतदाताओं में शुरू से ही डर और खौफ का माहौल रहा है. अगर नक्सलवाद की शुरुआत भी पश्चिम बंगाल से ही हुई थी तो इसका सबसे बड़ा कारण भी यही था – कांग्रेस पार्टी का डर. डर की ही राजनीति का हमेशा से प्रदेश में बोलबाला रहा है. गरीब और निम्न आय वर्ग के लोगों में कांग्रेस पार्टी के डर के विद्रोह के कारण वामदलों की सरकार पहली बार 1977 में बनी और वामदलों ने आतंक के साए में 34 साल तक राज किया.

बंगाल में आठ चरणों में चुनाव क्यों?

केंद्र में जिस दल की भी सरकार हो, उसे थोड़ा फायदा तो मिलता ही है. चुनाव आयोग के पास अपने सुरक्षाकर्मी नहीं होते हैं और जिस राज्य में चुनाव हो रहा हो वहां की पुलिस को सिर्फ आउटर रिंग में ही रखा जाता है, क्योकि राज्यों की पुलिस अक्सर सत्ता दलों के पक्षधर के रूप में ही देखी जाती हैं. उनसे बोगस वोटिंग या बूथ कैप्चरिंग को रोकने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती. लिहाजा चुनाव आयोग गृह मंत्रालय के इनपुट के आधार पर चुनाव के शेड्यूल की घोषणा करती है. अब दो बातें साफ़ है कि पश्चिम बंगाल में हमेशा से सत्तारूढ़ दल का मतदाताओं के दिल में डर बैठा होता है और पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव आठ चरणों में होगा, जो शायद एक विश्व रिकॉर्ड है.

यह भी पढ़े—Yuvraj Singh के नए लुक से हर तरफ मची खलबली,हुआ वायरल लोगों ने किए मजेदार कमेंट्स

डर के कारण बनेगी ममता की सरकार

चूँकि लगभग सभी ओपिनियन पोल में तृणमूल कांग्रेस को बहुत ही कम सीटों से जीत हासिल होती दिख रही है, बीजेपी का अनुमान है कि एक बार मतदाताओं के बीच से ममता बनर्जी के खिलाफ वोट डालने का डर हट जाए तो पासा पलट भी सकता है और प्रदेश में बीजेपी की सरकार बन जायेगी. बीजेपी का मानना है कि अगर तृणमूल कांग्रेस की फिर से सरकार बनती है तो इसका सबसे बड़ा कारण मतदाताओं का डर होगा कि अगर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ वोट डाला तो उन पर जुल्म का कहर टूट पड़ेगा. बीजेपी का मानना है कि अगर इस डर को वह तोड़ने में सफल रही तो फिर उसकी सरकार बननी तय है.

और ज्यादा खबरे पढ़ने और जाने के लिए ,अब आप हमे सोशल मीडिया पर भी फॉलो कर सकते है –
ट्विटर पर फॉलो करने के लिए टाइप करे – @khas_khabar एवं न्यूज़ पढ़ने के लिए #khas_khabar फेसबुक पर फॉलो करने के लाइव आप हमारे पेज @socialkhabarlive को फॉलो कर सकते है|