राष्ट्रीय

मराठा रिजर्वेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा,कितनी पीढ़ियों तक जारी रहेगा आरक्षण, प्रकट की चिंता

Khaskhabar/महाराष्ट्र पर मराठा आरक्षण लागू किये जाने के लिए राजनीतिक दबाव है। इसके लिए सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी पैरवी कर रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार जल्द ही इस मुद्दे का समाधान चाहती है लेकिन देश की सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान एक अलग प्रश्न पूछ लिया।

Khaskhabar/महाराष्ट्र पर मराठा आरक्षण लागू किये जाने के लिए राजनीतिक दबाव है। इसके लिए सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी पैरवी कर रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार जल्द ही इस मुद्दे का समाधान चाहती है लेकिन देश की सर्वोच्च
Posted by khaskhabar

सुप्रीम कोर्ट ने 50 प्रतिशत की सीमा हटाए जाने की स्थिति

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जानना चाहा कि कितनी पीढ़ियों तक आरक्षण जारी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने 50 प्रतिशत की सीमा हटाए जाने की स्थिति में पैदा होने वाली असमानता को लेकर भी चिंता प्रकट की।

वहीं महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ से कहा कि कोटा की सीमा तय करने पर मंडल मामले में (सुप्रीम कोर्ट के) फैसले पर बदली हुई परिस्थितियों में फिर से विचार करने की आवश्यकता है।

न्यायालयों को बदली हुई परिस्थितियों के मद्देनजर आरक्षण कोटा तय

सुप्रीम कोर्ट में मराठा समुदाय को आरक्षण प्रदान करने वाले महाराष्ट्र के कानून के पक्ष में दलील देते हुए रोहतगी ने मंडल मामले में फैसले के विभिन्न पहलुओं का हवाला दिया।
रोहतगी ने कहा कि न्यायालयों को बदली हुई परिस्थितियों के मद्देनजर आरक्षण कोटा तय करने की जिम्मेदारी राज्यों पर छोड़ देनी चाहिए और मंडल मामले से संबंधित फैसला 1931 की जनगणना पर आधारित था।

मुकुल रोहतगी ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों (ईब्ल्यूएस) को 10 फीसदी आरक्षण देने का केंद्र सरकार का फैसला भी 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन करता है।इस पर जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस एस अब्दुल नजीर, जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस रविंद्र भट की पीठ ने  कहा अगर 50 फीसदी की सीमा या कोई सीमा नहीं रहती है, जैसा कि आपने सुझाया है, तब समानता की क्या अवधारणा रह जाएगी।

कितने पीढ़ियों तक जारी रखेंगे?

इस पर पीठ ने टिप्पणी की, ‘यदि 50 प्रतिशत की सीमा या कोई सीमा नहीं रहती है, जैसा कि आपने सुझाया है, तब समानता की क्या अवधारणा रह जाएगी। आखिरकार, हमें इससे निपटना होगा। इस पर आपका क्या कहना है…इससे पैदा होने वाली असमानता के बारे में क्या कहना चाहेंगे। आप कितनी पीढ़ियों तक इसे जारी रखेंगे।’ पीठ में न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर, न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति रविंद्र भट शामिल हैं।

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कोर्ट ने बताई समीक्षा करने की वजह

रोहतगी ने कहा कि मंडल फैसले पर पुनर्विचार करने की कई वजह है, जो 1931 की जनगणना पर आधारित था। साथ ही, आबादी कई गुना बढ़ा कर 135 करोड़ पहुंच गई है। पीठ ने कहा कि देश की आजादी के 70 साल गुजर चुके हैं और राज्य सरकारें कई सारी कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं तथा ‘क्या हम स्वीकार कर सकते हैं कि कोई विकास नहीं हुआ है, कोई पिछड़ी जाति आगे नहीं बढ़ी है।’ न्यायालय ने यह भी कहा कि मंडल से जुड़े फैसले की समीक्षा करने का यह उद्देश्य भी है कि पिछड़ेपन से जो बाहर निकल चुके हैं, उन्हें अवश्य ही आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाना चाहिए।

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