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राष्ट्रीय

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का पॉजिटिविटी अनलिमिटेड,बोले- सफलता और असफलता अंतिम नहीं

Khaskhabar/पॉजिटिविटी अनलिमिटेड’ व्याख्यान कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शनिवार को संबोधित किया। यह कार्यक्रम कोविड रिस्पॉन्स टीम दिल्ली की ओर से किया जा रहा है। 11 मई से चल रहे इस आयोजन का शनिवार को आखिरी दिन है। इसमें भागवत ने कोरोना के हालात पर चर्चा करने के साथ ही कहा कि सफलता और असफलता अंतिम नहीं है। काम जारी रखने का साहस मायने रखता है।

Khaskhabar/पॉजिटिविटी अनलिमिटेड' व्याख्यान कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शनिवार को संबोधित किया। यह कार्यक्रम कोविड रिस्पॉन्स टीम दिल्ली की ओर से किया जा
Posted by khaskhabar

 उन्होंने कहा कि समाज की जो भी आवश्‍यकता है संघ के स्‍वयंसेवक पूर्त‍ि में लगे हैं। अब जो पर‍िस्‍थि‍त‍ि है उसमें खुद को सुरक्ष‍ित रखना है। वर्तमान पर‍िस्‍थ‍ित‍ि कठ‍िन है और नि‍राश करने वाली है, लेक‍िन नकारात्‍मक नहीं होना है और मन को भी नकारात्‍मक नहीं रखना है। साथ ही कहा कि जब तक जीत न जाएं तब तक लड़ना है। 

न‍िराशा की नहीं लड़ने की पर‍िस्‍थ‍ित‍ि है

सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि मन की दृृ़ढता सामूहि‍कता से काम करने और सत्‍य की पहचान करते हुुए काम करने की बात पूर्व के वक्‍ताओं ने की है। मुख्‍य बात मन की है। मन अगर थक गया, तो दिक्कत होगी। जैसे सांप के सामने चूहा अपने बचाव के लि‍ए कुछ नहीं करता। ऐसा नहीं होने देना है। वि‍कृत‍ि के बीच संस्‍कृत‍ि की बात सामने आ रही है। वर्तमान समय न‍िराशा का नहीं लड़ने की पर‍िस्‍थ‍ित‍ि है।

दुख की चुनौती मानकर संकल्‍प कर लड़ना है

पांच दिवसीय आयोजन के अंतिम दिन अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि यह समय रोजाना हमारे मन को उदास और कटु बनाएगा। सारी समस्‍याओं को लांघकर सभ्यता आगे बढ़ी है। समाज की च‍िंता और प्‍लेग के रोगि‍यों की सेवा करते हुए हेडगेवार के माता-प‍िता चले गए, तो क्‍या उनका मन कटूता से भर गया, ऐसा नहीं है, बल्‍कि‍ उन्होंने आत्‍मीयता का संबंध बनाया।

खाली मत रहि‍ए कुछ नया सीख‍िए

मोहन भागवत ने कहा कि देर से जागे कोई बात नहीं है, लेकिन अंतर भरकर आगे न‍िकलना चाहि‍ए। ऑनलाइन सीखने की व्‍यवस्‍था हो गई है। बहुत कठ‍िन क्र‍ियाएं नहीं, बल्कि सात्‍व‍िक आहार, शरीर की ताकत को बढ़ाने वाला आधार हो, पर वैज्ञानिकता का भी आधार हो। जो भी आ रहा है उसको परखकर लेना चाह‍िए। हमारा स्‍वयं का अनुभव व वैज्ञानि‍क परीक्षण के आधार पर लें।

सावधानी रखकर उपचार और आहार का सेवन होना चाह‍िए

हमारी ओर से बेस‍िर पैर की बात न जाएं। आयुर्वेद के पीछे तर्क है, उसे लेने में कोई द‍िक्‍कत नहीं है, पर सबको लाभ हो ऐसा भी नहीं। ऐसे में सावधानी रखकर उपचार और आहार का सेवन होना चाह‍िए। खाली मत रहि‍ए कुछ नया सीख‍िए, बच्‍चों से संवाद कायम करे। कुटुंब का भी। पर्याप्‍त अंतर पर रहकर संपर्क, स्‍वच्‍छता कापालन करना, मास्‍क लगाएं। सावधानी हटती है तो दुर्घटना घटती है।  गड़बड़ हो गई तो उपचार लें।

बच्‍चों की शि‍क्षा में प‍िछड़ने का दूसरा वर्ष

बदनामी का डर और अस्‍पताल की स्‍थि‍त‍ि देखकर उपचार नहीं लेते, लेकिन तुरंत च‍िक‍ित्‍सकीय सलाह लेकर प्राथमि‍क सावधान‍ियां बरतने से आदमी इससे बाहर आ सकता है।  जन प्रबोधन और जन प्रश‍िक्षण का बड़ा महत्‍व है। प्रत्‍यक्ष सेवा करनी है तो उनके लि‍ए बेड-ऑक्‍सीजन की व्‍यवस्‍था करनी है। पहली लहर में की थी। अब उससे अध‍िक करने की आवश्‍यकता है। बच्‍चों की शि‍क्षा में प‍िछड़ने का दूसरा वर्ष, वह ज्ञान में न पि‍छड़े इसकी चि‍ंता है।रोज कमाने-खाने वाले का रोजगार बंद न हो। उनकी चि‍ंता होनी चाहिए और वह भूखे न रहें।

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मनोबल गिराने की आवश्यकता नहीं

साध्वी के अलावा श्री पंचायती अखाड़ा-निर्मल के पीठाधीश्वर संत ज्ञानदेव ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया था। उन्होंने कहा था टकेवल भारतवर्ष में नहीं संपूर्ण विश्व में जो यह संक्रमण काल चल रहा है, इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है, मनोबल गिराने की आवश्यकता नहीं है। जो भी वस्तु संसार में आती है, वह सदा स्थिर नहीं रहती। दुःख आया है, वह चला जाएगा।

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