राष्ट्रीय

पेपर मिलों के प्लास्टिक कचरे से नहीं होगा वायु प्रदूषण,उ.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

Khaskhabar/पेपर मिलों से निकलने वाले प्लास्टिक कचरे से अब वायु प्रदूषण नहीं होगा। आसपास की जमीन भी कचरे से पटी नहीं रहेगी। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पश्चिम यूपी की पेपर व पल्प इंडस्ट्री के प्लास्टिक कचरे के इको फ्रेंडली निस्तारण का रास्ता खोज लिया है। मुजफ्फरनगर, मेरठ व गाजियाबाद की पेपर मिलों से अब प्लास्टिक कचरा राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित अल्ट्राटेक सीमेंट फैक्ट्री भेजा जाने लगा है।

Khaskhabar/पेपर मिलों से निकलने वाले प्लास्टिक कचरे से अब वायु प्रदूषण नहीं
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दरअसल,इंडस्ट्री से निकलने वाले कचरे का निस्तारण उनकी ही जिम्मेदारी होती है। इसे निस्तारित करने के लिए कई बार पेपर मिलें इसे जला देती थीं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इन मिलों को कचरे के कारण अक्सर जुर्माना लगा देता था। इस समस्या को देखते अब पेपर मिलों के लिए प्लास्टिक कचरे के निस्तारण का इको फ्रेंडली रास्ता निकाल लिया गया है।

1500 डिग्री में प्लास्टिक कचरे को ईंधन के रूप में जलाया जाता है

यहां से निकलने वाले प्लास्टिक कचरे को राजस्थान के चित्तौड़गढ़ स्थित अल्ट्राटेक सीमेंट फैक्ट्री भेजा जाने लगा है। जुलाई से अक्टूबर के बीच निकले 3621.04 टन कचरा को-प्रोसेसिंग के लिए सीमेंट फैक्ट्री भेज दिया गया है। यहां 1500 डिग्री में प्लास्टिक कचरे को ईंधन के रूप में जलाया जाता है।

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मुजफ्फरनगर में 25, मेरठ में 17 और गाजियाबाद में छह पेपर रिसाइकिल इंडस्ट्री हैं। यह रद्दी पेपर, गत्ते व डिब्बे को प्रॉसेस कर पेपर बनाती हैं। रद्दी पेपर व डिब्बों में पतली पन्नी चढ़ी होती है, जो नॉन रिसाइक्लेबिल प्लास्टिक होती है। इसलिए पेपर इंडस्ट्री इस पतली पन्नी को निकाल लेती हैं। इसे आसपास के खाली स्थानों पर डंप किया जाता था। इसे ईंट भट्टे वाले या फिर छोटे प्लांट वाले अपने यहां ईंधन के रूप में जलाते थे। इस प्लास्टिक को यदि 1100 डिग्री से कम में जलाया जाता तो इससे खतरनाक टॉक्सिक गैसें निकलती हैं।इससे कैंसर होने का खतरा होता है।

केवल फ्यूल के रूप में इस्तेमाल हो सकता है

पेपर मैनुफैक्चरर एसोसिएशन अध्यक्ष पंकज अग्रवाल ने बताया कि उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने हमारी प्लास्टिक कचरे की समस्या समाप्त कर दी है। इसको लेकर बहुत तनाव रहता था। नॉन रिसाइक्लेबिल होने के कारण यह केवल फ्यूल के रूप में इस्तेमाल हो सकता है। किंतु ईंट-भट्टे व ब्यायलर में इसे जलाने से जहरीले गैसें निकलती हैं जो सेहत को नुकसान पहुंचाती हैं। नई व्यवस्था से सभी को आराम हो गया है।

उत्तर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड ने अहम भूमिका

आदित्य सीमेंट वर्क, चित्तौड़गढ़, राजस्थान के जीएम अखिलेश्वर उपाध्याय ने बताया कि मुजफ्फरनगर, मेरठ व गाजियाबाद की पेपर मिलों के साथ हमारा समझौता हो गया है। इसमें उत्तर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड ने अहम भूमिका है। यहां से प्लास्टिक वेस्ट हमारी सीमेंट फैक्ट्री भेजा जा रहा है। इससे न सिर्फ प्लास्टिक कचरा निस्तारित हो सकेगा बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।

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संकट में मुजफ्फरनगर का पेपर उद्योग

पेपर इंडस्ट्री में मुजफ्फरनगर का देश में पहला स्थान है। यहां 32 पेपर मिल है। देश की सबसे बड़ी पेपर मिले भी यहीं हैं। पेपर उद्योग से यहां हजारों लोगों को रोजगार मिल रहा है। बीते कुछ दिन से यहां पेपर उद्योग पर संकट के बादल छाए हुए हैं। पेपर का कच्चा माल अब से पहले यहां अधिक मात्रा में विदेशों से आता रहा है। वर्तमान में ऐसे हालात बने हुए है कि बाहर से कच्चा माल आयात नहीं हो पा रहा है। पेपर इंडस्ट्री लोकल की रद्दी पर ही निर्भर है। कच्चे माल के रूप में जो रद्दी यहां 10 रुपये किलो मिल रही थी वह अचानक 17 रुपये किलो पर पहुंच गई है। इससे पेपर की लागत बढ़ गई है। लागत के हिसाब से बाजार में पेपर के दाम नहीं मिल पाने से फैक्टरियों के लिए पेपर उत्पादन घाटे का सौदा बन गया है।

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