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धनतेरस पर दर्शनों के लिए पहुंचते हैं लोग,विदिशा में है कुबेर की सबसे ऊंची प्रतिमा

Khaskhabar/धनतेरस पर कुबेर की पूजा की जाती है। माना जाता है कि कुबेर की पूजा से धन धान्य की पूर्ति होती है।धन के देवता कहलाने वाले कुबेर की देश में सबसे ऊंची प्रतिमा विदिशा में है। 12 फीट ऊंची ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की यह प्रतिमा बैस नदी से खोदाई के दौरान मिली थी, जिसे पुरातत्व संग्रहालय के मुख्य द्वार पर स्थापित किया गया है। हर साल धनतेरस पर कुबेर के दर्शनों के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। पुरातत्वविदों के अनुसार देश में कुबेर की यह दूसरी प्रतिमा है। बिहार के दीदारगंज में मिली एक प्रतिमा नई दिल्ली के राष्ट्रीय पुरातत्व संग्रहालय में रखी है।

Khaskhabar/धनतेरस पर कुबेर की पूजा की जाती है। माना जाता है कि कुबेर की
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राज्य पुरातत्व विभाग के जिला संग्रहालय प्रभारी रहे पुरातत्वविद एमके माहेश्वरी बताते हैं कि सन 1955 से 60 के बीच बैस नगर की खोदाई के दौरान नदी के किनारे यह प्रतिमा मिली थी, जो ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की मानी जाती है। वे बताते हैं कि दूसरी शताब्दी में कुबेर को यक्ष माना जाता था। उनकी ग्राम देवता के रूप में पूजा होती थी। रामायण काल में भी कुबेर का संदर्भ मिलता है।

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रामायण में रावण द्वारा कुबेर को युद्ध में हराकर उनका पुष्पक विमान छीनने का उल्लेख भी मिलता है। करीब 12 फीट ऊंची और ढाई फीट चौड़ी इस प्रतिमा को लोक निर्माण विभाग के रेस्ट हाउस के पास रख दिया था, जो लंबे समय तक वहां रखी रही। बाद में जब जिला संग्रहालय का निर्माण हुआ तो उसे संग्रहालय के मुख्य प्रवेश द्वार में रखा गया है।

एक ही पत्थर को काटकर बनाई है प्रतिमा

माहेश्वरी के मुताबिक एक ही पत्थर को काटकर खड़ी मुद्रा में इस विशाल प्रतिमा को बनाया गया है। यह बलुआ पत्थर पर उकेरी गई है। इस प्रतिमा के सिर पर पगड़ी और कंधों तक उत्तरीय वस्त्र हैं। कानों में कुंडल और गले में कंठा भी दर्शाया गया है। इस प्रतिमा के एक हाथ में धन की थैली स्पष्ट दिखाई देती है। माहेश्वरी का कहना है कि देश में इतनी विशालकाय और प्राचीन प्रतिमा कहीं नहीं है। इसके अलावा संग्रहालय में एक अन्य कुबेर की प्रतिमा बैठी मुद्रा में है, जो ग्राम बढ़ोह से खोदाई के दौरान मिली थी। यह 7वीं-8वीं शताब्दी की बताई जाती है।

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धार्मिक ग्रंथों में मिलता है उल्लेख

शहर के ज्योतिषाचार्य पं. संजय पुरोहित बताते हैं कि धार्मिक ग्रंथों में भी कुबेर की पूजा का उल्लेख मिलता है। रामायण सहित अन्य ग्रंथों में कुबेर को हिंदू धर्म के प्रमुख यक्षों में से एक बताया गया है। उन्हें धन के देवता के अलावा उत्तर दिशा का स्वामी भी माना जाता है। अथर्ववेद में कुबेर को यक्षराज भी कहा गया है। पुरोहित के मुताबिक दीपावली को मां लक्ष्मी का त्योहार माना जाता है। इसीलिए लक्ष्मी पूजन से पहले धनतेरस पर कुबेर की पूजा की जाती है। माना जाता है कि कुबेर की पूजा से धन धान्य की पूर्ति होती है।

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