राजनाथ सिंह
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एससीओ की बैठक में हिस्सा लेने मॉस्को पहुंचे राजनाथ सिंह, रूसी रक्षा मंत्री से आज करेंगे मुलाकात

Khas Khabar|भारत-चीन तनाव के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बुधवार को तीन दिवसीय दौरे पर रूस पहुंच गए हैं। वह रुस में आयोजित होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेंगे। रक्षा मंक्षी राजनाथ सिंह आज अपने रूसी समकक्ष जनरल सर्गेई शोयगू से मुलाकात इस दौरान वह रूस के रक्षा मंत्री से द्विपक्षीय रक्षा सहयोग बढ़ाने पर भी बातचीत करेंगे।

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अधिकारियों ने बताया कि शुक्रवार को एससीओ के आठ सदस्य देशों का प्रतिनिधिमंडल क्षेत्रीय रक्षा चुनौतियों पर चर्चा करेगा। इस दौरान आतंकवाद और कट्टरपंथ जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श होगा।राजनाथ सिंह एससीओ बैठक के लिए बुधवार की शाम अपनी तीन दिवसीय यात्रा पर रूस की राजधानी मॉस्को पहुंचे। हवाई अड्डे पर मेजर जनरल बी यू निकोलेविच द्वारा उनका स्वागत किया गया। रूस पहुंचने के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ट्वीट कर लिखा कि आज शाम मॉस्को पहुंचा। उन्होंने साथ ही लिखा कि कल रूसी समकक्ष जनरल सर्गेई शोयगू के साथ मेरी द्विपक्षीय बैठक होगी।

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चीनी समकक्ष से नहीं मिलेंगे राजनाथ सिंह

सूत्रों के अनुसार भारत और चीन के सीमा विवाद के बीच होने वाली इस बैठक में राजनाथ सिंह चीनी नेता से बात नहीं करेंगे। इस बैठक में चीन के रक्षा मंत्री भी होंगे, हालांकि दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय मुलाकात की संभावना खारिज की जा चुकी है। रूस के रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगू से राजनाथ सिंह की मुलाकात होनी तय है जिसमें दोनों देशों के बीच भावी रक्षा सौदों को लेकर अहम चर्चा होगी। चीन के साथ पूर्वी लद्दाख सीमा पर भारी सैन्य तनाव के बावजूद रक्षा मंत्री का एससीओ बैठक में पहुंचना बताता है कि चीन के वर्चस्व वाले इस संगठन को लेकर भारत अभी पूरी तरह से हतोत्साहित नहीं है। हां, निकट भविष्य में एससीओ या ब्रिक्स के साथ भारत का रवैया इस बात पर निर्भर करेगा कि चीन के साथ द्विपक्षीय रिश्ते किस तरफ जाते हैं।

एससीओ में कौन-कौन से देश हैं शामिल ?

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भारत और पाकिस्तान वर्ष 2017 में ही एससीओ के प्रमुख सदस्य के तौर पर शामिल हुए हैं। चीन के अलावा इसमें भारत के अहम रणनीतिक साझेदार रूस, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान व कजाखस्तान सदस्य देश हैं।

जल्द ही इसमें ईरान, श्रीलंका समेत कुछ और देशों को भी शामिल करना है। एससीओ को भारत हमेशा यह सोच कर समर्थन करता रहा है कि यह बहु-धुव्रीय विश्व बनाने में मदद करेगा। चीन की अग्रणी भूमिका वाली ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका) का सदस्य बनने के पीछे भी कमोबेश यही सोच रही है। वर्ष 2017 के डोकलाम विवाद को पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच एससीओ शिखर बैठक में हुई मुलाकात ने सुलझाने में मदद की थी।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि एससीओ और ब्रिक्स के एजेंडे में अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है जिसे भारत विरोधी कहा जाए। ब्रिक्स देशों के बीच एक वित्तीय संस्थान गठित किया गया है जिससे भारत दूसरे देशों से ज्यादा कर्ज ले रहा है। एससीओ राष्ट्र प्रमुखों की वर्ष 2018 की बैठक में आतंकवाद पर एक अहम प्रावधान जुड़वाने में भारत सफल रहा था। इसे पाकिस्तान के लिए धक्का माना गया था कि चीन के होते हुए भी भारत की बात मानी गई। एससीओ में मध्य एशियाई देश कारोबार के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। जहां एससीओ के जरिये भारतीय उत्पादों की पैठ बन सकती है।

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